जिंदगी है सितारों में,
बस माँ कि दुआ से,
कब माँगा है,
मैंने खुदा बोल,
कुछ भी सिवा,
माँ कि निगाहों के.
क्या रखा है,
जन्नत में,
क्या चाँद कि,
आदावों में,
कब चाहा है,
मैंने खुदा बोल,
कुछ भी सिवा,
माँ कि चरणों के, परमीत.
जुमला वो ही पढ़ो,
जो जानकारी दे,
बरना क्या रखा है,
हिंदी में, उर्दू लिखने में.
साँसे जितनी भी जियो,
जियों शान से मगर,
बरना क्या रखा है,
मयखाने में,
मंदिर जाने में.
चाहे जो भी करो काम दोस्तों,
पर आंसूं ना आयें माँ कि आँखों में,
बरना क्या रखा है,
टाटा होने, बिरला होने में, परमीत.

बिल्लियों के बीच में खेलती हैं,
बिल्लियों से बनके वो,
कभी आँख लड़ती,
तो कभी आँख चुराती वो.
चलती है इधर- उधर,
अदावों से इतराते हुए,
कभी छज्जे पे बैठी,
कभी आँगन,
में जलवे बिखराती वो.
इक पल में ही हज़ारो,
रंग उतर आते हैं, आँखों में,
कभी रातों में सजती,
कभी ठुमके लगाती वो, परमीत

गंगा की मौज वोही,
हिमालय का ताज वोही,
पर,
भारत बेचैन है, क्यों?
दिल्ली का ताज वोही,
आदमी का राज वोही,
जनता का भ्रम वोही,
नेता का सरम वोही,
पर,
भारत बेचैन है, क्यों?
आसमा का चाँद वोही,
धरती का ताप वोही,
नेता का त्याग वोही,
जनता का इमां वोही,
पर,
भारत बेचैन है, क्यों?
क्या इस लिए की,
लोहिया की वो परखी नज़र नहीं,
चन्द्रसेखर के कुटिल वो बाण नहीं,
बाजपेयी के तीखे ब्यंग नहीं,
या जेपी का वो योवन नहीं.
क्या इसलिए, की आज
विपक्ष धरासायी है,
सत्ता की वाहवाही है,
कहीं बाबा रामदेव तो कही अन्ना ,
घिचते ये गाड़ी है.
जी नहीं,
आज भारत बेचैन ही की,
ईमानदारी के तराजू पे,
तोलकर एक एसा नेता चुना गया,
जो कमजोर नहीं, एक चोर है,
मजबूर नहीं, बेशर्म है,
जो बोलता है, पर करता नहीं,
सुनाता है अपनी, पर आम कि सुनता नहीं,
जो करता नहीं, सिर्फ बैठता है,
सत्ता कि कुर्सी पे.
भारत बेचैन है, क्यों की,
इतिहास गवाह है, की
राजा जब-जब कमजोर हुए है,
आराजकता फैली है,
लेकिन,
जब-जब दोगले हुए है,
तो भारत में पराधीनता फैली है, परमित.