अगर मैं यूँ ही इम्तिहानों को ठुकराता रहा,
मुमकिन है कि मैं केजरीवाल बन जाऊं,
पर मेरी तमन्ना सल्तनत कि है,
न कि मैं किसी शह का मोहरा बन जाऊं।
अगर मैं यूँ ही सबपे उंगलियां उठता रहा,
मुमकिन है कि मैं केजरीवाल बन जाऊं,
मगर मेरी तमन्ना बुलंदियों कि है,
न कि मै किसी कि सीढ़ी बन जाऊं।
अगर मैं यूँ ही भौंकता रहा,
मुमकिन है कि मैं केजरीवाल बन जाऊं,
मौत पसंद है मुझे रण में लड़ते हुए, परमीत
न कि मैं किसी विषकन्या का पंथ बन जाऊं।