प्रथम-मिलन III


पलकों पे इतना,
भी न शर्म लाइए,
इन जवाँ रातों को,
न यूँ सुलाइए।
प्यास जो हैं मेरे,
इन ओठों पे,
आज अपनी लबों से,
उसे चुरा लीजिये।
छूने से ही अगर,
इतना सिमट जाएंगी,
जाने फिर वो घड़ी,
अब-कब आएगी।
आंचल को इतना,
भी न तन से बांधिए,
इन जवाँ रातों को,
न यूँ सुलाइए।
तोड़ कर,
किनारों को अपने,
दरिया को आज,
परमीत के सागर में,
मिल जाने दीजिये।

Leave a comment