बहुत खुसनसीब हैं वो लोग,
जिनको कद्रदान मिलें,
हमें आज तक, जो भी मिले,
सिर्फ, अनजान ही मिलें.
की,
दर्दे-उल्फत अब क्या कहें तुमसे,
की,
कसीदे पढ़ें हमने जिनकी
तारीफें-मोहब्बत में,
उनको भाया वो,
जिससे मिलते हैं वो
चोरे-बाज़ार में.
उनको हमारा इश्क में,
अंदाजे-जिगर नहीं भाया,
वर्ना,
चोर-बाजारी तो हम भी करते हैं,
और, वो जिगर नहीं रखते,
उनके इश्क का परमित,
जिनका, अंदाजे-बयां वो,
अपने शर्मो -हया से करते हैं.