जब निकलती हूँ मै डाल के,
घूँघट अपने मुखड़े पे,
तो छुप जाता है सूरज,
जाने-जाके किन गलियों में.
जब चलती हूँ उठा के,
घूँघट मैं अपने मुखड़े से ,
तो चाँद भी बहक जाता है,
मेरे यौवन के रस से.
कैसी जवानी,
रब्बा तुने है दी मेरे तन पे,
हर गली में एक आशिक हैं मेरा,
हर घर में है एक सौतन रे.
कैसे छोड़ दूँ मैं,
साजन को अकेले होली में,
कितनो कि नजर मुझपे है,
और कितनो कि मेरे घर पे, परमीत