कभी वो हुस्न थी,
और मैं इश्क था
आज वो बेचैन हैं,
और मैं शांत सा.
कभी वो रात थी,
और मैं ख्वाब सा,
आज वो दरिया हैं,
और मैं सागर सा,
कि वक्त ने जब भी,
कि हैं मुझे तोड़ने कि साजिस,
मिट जाने से पहले,
मैं उठा हूँ परमीत लहरो सा.
कभी वो हुस्न थी,
और मैं इश्क था
आज वो बेचैन हैं,
और मैं शांत सा.
कभी वो रात थी,
और मैं ख्वाब सा,
आज वो दरिया हैं,
और मैं सागर सा,
कि वक्त ने जब भी,
कि हैं मुझे तोड़ने कि साजिस,
मिट जाने से पहले,
मैं उठा हूँ परमीत लहरो सा.