सोलहगो होली खेलनी मायका में,
मायका में,
पर अंग पे रंग चढ़ल ससुरा में.
पाहिले त आँखवा में आंसू आइल,
न अब माई-बहिनी भेटाई रे,
पर रोम-रोम पुलकित हो गइल,
जब नंदी मरलख पिचकारी से.
पिचकारी से.
गावं-गावं होली खेलनी मायका में,
मायका में,
पर अंग पे रंग चढ़ल ससुरा में.
दोपहर भइल फिर साँझ भइल,
सुने न कोई हमर गारी रे,
अरे चूड़ी टुटल, कंगन टुटल,
जब धइलख देवर अँकवारी में.
नाच-नाच होली खेलनी मायका में,
मायका में,
पर अंग पे रंग चढ़ल ससुरा में, परमीत
Month: March 2014
मानसिकता
कबूतरों के राज्य में राजा कबूतर ने नए उतराधिकारी को चुनने के लिए बुद्धिमान कबूतरों की सभा में चर्चा की. उनके राज्य में लड़का और लड़की में कोई अंतर नहीं था. सभी सामान थे, लेकिन राजा बन ने के लिए एक शर्त थी की उतराधिकारी कभी झूठ ना बोले. यहाँ तक की राजा बन ने के बाद भी. कठिनाई ये थी की दोनों उमीदवारों ने कभी झूठ बोला ही नहीं, तो राज्य किसको दिया जाये? नए कबूतर राजकुमारी को चाहते थे, उन सबने उनके लिए मत दिया. बहुमत ना बन पाने की दृष्टि में राजा ने गुरु से परामर्श किया. गुरु मुस्कराय और राज्य राजकुमार को दे दिया. प्रश्न ये उठता है की क्या राजगुरु सही थे या उन्होंने गलत किया पुरुष प्रधानता की मानसिकता के तहत बंध कर……परमीत
होली
कबूतरों की भीड़ में एक नर कबूतर बोला होली आई -होली आई,
परमित और होली…
कौन कहता ही की होली रंगों का खेल है,
जवानी के दांव
जब से जवान भइल बारू,
गुलशन के आम भइल बारू।
ललचअ तारन केजरीवाल भी,
आ बुढऊ अन्ना के,
जी के जंजाल भइल बारू।
शीला के कईलु तू पानी-पानी,
ये ही उम्र में ममता के,
जी के घाव भइल बारू।
मोदी भी बारन धोती खोंट के,
बाबा राहुल के,
जवानी के दांव भइल बारू।
होली और सौतन
जब निकलती हूँ मै डाल के,
घूँघट अपने मुखड़े पे,
तो छुप जाता है सूरज,
जाने-जाके किन गलियों में.
जब चलती हूँ उठा के,
घूँघट मैं अपने मुखड़े से ,
तो चाँद भी बहक जाता है,
मेरे यौवन के रस से.
कैसी जवानी,
रब्बा तुने है दी मेरे तन पे,
हर गली में एक आशिक हैं मेरा,
हर घर में है एक सौतन रे.
कैसे छोड़ दूँ मैं,
साजन को अकेले होली में,
कितनो कि नजर मुझपे है,
और कितनो कि मेरे घर पे, परमीत
होलिका-दहन
रंगे-मोहब्बत चमक उठती है,
आज भी,
उनके एक नज़र मिलाने से,
दर्दे-जिगर को,
क्या समझाउं परमित,
जो आज भी बहल जाता है,
उनके सिर्फ मुस्कराने से.
वो खेल जाती हैं होली,
आज भी,
मेरी तमन्नावों से,
एक कसक सी उठती है,
जब फरेबे-मोहब्बत की,
जो उनके सिने में.
की जाने कब तक लुटता रहेगा,
यूँ ही मेरा आसियाना,
हर साल आ जातीं है वो,
होलिका-दहन मानाने,
मेरे ही आँगन में.
दर्दे-उल्फत
बहुत खुसनसीब हैं वो लोग,
जिनको कद्रदान मिलें,
हमें आज तक, जो भी मिले,
सिर्फ, अनजान ही मिलें.
की,
दर्दे-उल्फत अब क्या कहें तुमसे,
की,
कसीदे पढ़ें हमने जिनकी
तारीफें-मोहब्बत में,
उनको भाया वो,
जिससे मिलते हैं वो
चोरे-बाज़ार में.
उनको हमारा इश्क में,
अंदाजे-जिगर नहीं भाया,
वर्ना,
चोर-बाजारी तो हम भी करते हैं,
और, वो जिगर नहीं रखते,
उनके इश्क का परमित,
जिनका, अंदाजे-बयां वो,
अपने शर्मो -हया से करते हैं.
नया जाम
मेरी जिंदगी अब मुझे,
एक नया अंदाज दे,
कुछ नहीं तो दर्द को मेरे,
एक नया आसमां दे.
लौट सकता नहीं अब मैं,
उनके दामन में परमित,
कुछ नहीं तो मेरी ओठों को,
एक नया जाम दे, परमीत.
होली
ज़िन्दगी है,
सो गुज़र रही है,
वरना हमें गुजरे,
तो ज़माने हुए.
कोई मिल गया,
तो होली खेल लेंगे,
वरना किसी को रंग लगाये,
तो जमाने हुए, परमीत.