इसे मेरा प्रेम तो न समझो


एक-एक करके,
काट दिया था,
वशिष्ठ के पुत्रों को,
नारी हो तुम,
छोड़ रहा हूँ,
इसे मेरा प्रेम तो न समझो।
कैसा प्रेम, कैसा प्यार,
तुम प्यादा हो,
इस शह और मात,
के खेल में,
तुम्हे प्राप्त कर, मैंने,
हरा दिया है आज इंद्रा को,
इसे मेरा अनुराग तो न समझो।
कैसा धर्म, कैसी विवशता
तुम लौट सकती थी,
प्रथम-मिलन के बाद भी,
तब तुम्हारा ऐसा अंत न होता,
शकुंतला रो रही है,
छोड़ रहा हूँ,
इसे मेरा पराजय तो न समझो।
स्वर्ण और सत्ता को,
जिसने ठुकराया,
आज भी रो रही है,
कितनी रानियां,
जिसने रचा है माँ गायत्री को,
उसे अपनी वफ़ा
के झूठ में जीता अज्ञानी तो न समझो, परमीत।

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