ठोकर खायी मोहब्बत में जिस दिन,
मुझको भी नारी का ज्ञान हुआ,
अभिमान था मुझे अपने योवन पे,
पर मैं भी भीष्म सा पराजित हुआ.
लेकर जिनको बाहों के घेरे में,
मैं इतराता रहता था,
जब चौरस खेली उनके नाम की,
तो मैं भी युधिष्ठिर सा पराजित हुआ.
मैंने उखड़ा है कितने ही सर्पो के,
जबड़े से उनके दांतों को,
मगर बात आई जब मेरे जीवन की,
तो परमीत,
मैं भी परीक्षित सा पराजित हुआ.