वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान
तुझसे ही मेरा घर, तुझसे ही मेरा संसार.
तुमने लुटा दी मेरे लिए अपनी हरी-भरी जवानी
तुमने त्याग दिया मेरे लिए अपना सारा श्रृंगार।
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
तेरी गोद में सोया, तेरे संग सारी-रात काटी
स्वार्थी मन मेरा, फिर भी तुझपे खुरपी चला दी.
फिर भी जब-जब लौटा, तूने भर दिया मेरा खलिहान।
तुझसे ही जल रहा हैं मेरा चूल्हा दिन रात.
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
तेरे लिए ही उतरी गंगा धरती पे
तेरे लिए ही नंदी, लेके हैं हल कांधों पे
तेरे लिए शिव-शंकर ने किया विष-पान.
वो कटे चने के खेत, तू है मेरे भारत की शान.
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
तेरे ही योवन पे, जी रहा है किसान।
जब- जब तेरे ह्रदय पे, किया है मैंने प्रहार,
तूने अपनी ममता से, भर दिया है मेरा खलिहान।
वो कटे चने के खेत,अनुपम तेरा बलिदान।
तेरी ही अंगराई से, है मेरे मूछों का अभिमान।
जब-जब आया हूँ दर पे तेरे, मैं भूखा, खाली हाँथ,
तूने लूटा कर खुद को, भर दिया है मेरा आँगन और बथान।
तेरे ही आँचल में, मुस्काता है धुरंधर इंसान।
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
Bhojpuri poet Dhurandhar Singh wrote this. I just compiled.