जीत-हार


न जीत न हार, सत्य है प्यार
क्या जीते थे राम, रावण का अंत कर
क्या जीते थे राम, सीता का त्याग कर
क्या जीते थे पांडव, दुर्योधन का अंत कर 
क्या जीते थे पांडव, भीष्म का अंत कर
जीत कर भी, होती है अक्सर हार,
कर दे इस, माया का त्याग
रस है इस, जीवन का त्याग
सत्य है प्यार, न जीत न हार

 by a friend 

परमीत का चैन और परमीत का दिल


इधर गया, उधर गया
यहाँ रहा, वहां रहा
इस दिल को,
चैन कभी मिला नहीं।
कोई तसल्ली,
इस दिल को दे,
ऐसा भी,
कोई मिला नहीं।

हार से,
यह टूटा नहीं
न जीत से,
अहंकारी हुआ
कुछ देर, थमा जरूर
पर धड़कना,
इसने छोड़ा नहीं।

आज भी, धड़कता है,
कल भी, धड़केगा,
उन सुनहरे दिनों की तलाश में,
जहाँ इस की दिलरुबा होगी,
इस का चैन होगा,
प्रेम की बौछार होगी,
चैन इस की साँस होगी।

अनाडी-बलमा


दरिया इतना उछलती है क्यों,
जरा हमको बता बलमा।
सागर इतना है गहरा हाँ क्यों ,
जरा हमको समझा बलमा।
कौआ आसमान में उड़ता है क्यों,
क्यों, फूलो पे मंडराएं भौरां।
कालिया खिलती हैं सुबह में क्यों,
जरा हमको बता बलमा।
सूरज बिखरायें किरणों को क्यों,
जरा हमको समझा बलमा।
बहती हवा का मुझे छू जाना,
क्यों, भाता है जुल्फों का लहराना,
गिराती हूँ मैं यूँ आँचल को क्यों,
जरा हमको बता बलमा।
परमीत, तू इतना है अनाडी हाँ क्यों,
जरा हमको समझा बलमा।

इसे मेरा प्रेम तो न समझो


एक-एक करके,
काट दिया था,
वशिष्ठ के पुत्रों को,
नारी हो तुम,
छोड़ रहा हूँ,
इसे मेरा प्रेम तो न समझो।
कैसा प्रेम, कैसा प्यार,
तुम प्यादा हो,
इस शह और मात,
के खेल में,
तुम्हे प्राप्त कर, मैंने,
हरा दिया है आज इंद्रा को,
इसे मेरा अनुराग तो न समझो।
कैसा धर्म, कैसी विवशता
तुम लौट सकती थी,
प्रथम-मिलन के बाद भी,
तब तुम्हारा ऐसा अंत न होता,
शकुंतला रो रही है,
छोड़ रहा हूँ,
इसे मेरा पराजय तो न समझो।
स्वर्ण और सत्ता को,
जिसने ठुकराया,
आज भी रो रही है,
कितनी रानियां,
जिसने रचा है माँ गायत्री को,
उसे अपनी वफ़ा
के झूठ में जीता अज्ञानी तो न समझो, परमीत।

अनुपम तेरा बलिदान


वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान
तुझसे ही मेरा घर, तुझसे ही मेरा संसार.
तुमने लुटा दी मेरे लिए अपनी हरी-भरी जवानी
तुमने त्याग दिया मेरे लिए अपना सारा श्रृंगार।
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।

तेरी गोद में सोया, तेरे संग सारी-रात काटी
स्वार्थी मन मेरा, फिर भी तुझपे खुरपी चला दी.
फिर भी जब-जब लौटा, तूने भर दिया मेरा खलिहान।
तुझसे ही जल रहा हैं मेरा चूल्हा दिन रात.
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।

तेरे लिए ही उतरी गंगा धरती पे
तेरे लिए ही नंदी, लेके हैं हल कांधों पे
तेरे लिए शिव-शंकर ने किया विष-पान.
वो कटे चने के खेत, तू है मेरे भारत की शान.
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।

वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।
तेरे ही योवन पे, जी रहा है किसान।
जब- जब तेरे ह्रदय पे, किया है मैंने प्रहार,
तूने अपनी ममता से, भर दिया है मेरा खलिहान।
वो कटे चने के खेत,अनुपम तेरा बलिदान।

तेरी ही अंगराई से, है मेरे मूछों का अभिमान।
जब-जब आया हूँ दर पे तेरे, मैं भूखा, खाली हाँथ,
तूने लूटा कर खुद को, भर दिया है मेरा आँगन और बथान।
तेरे ही आँचल में, मुस्काता है धुरंधर इंसान।
वो कटे चने के खेत, अनुपम तेरा बलिदान।

Bhojpuri poet Dhurandhar Singh wrote this. I just compiled.

मैं उस पिता का पुत्र हूँ


मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जो धरती पे किसी से हारा नहीं,
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जो उर्वशी पे भी डिगा नहीं।
खडग उठा लिया है जब,
तो करो मेरा सामना महारथियों,
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जिसका तीर कभी चूका नहीं।
शिशु समझ के मौत का भय,
किसको दिखा रहे हो,
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जो रण में शिव से भी डरा नहीं।
तुम उन्माद में हो अपने शौर्य के,
मैं जवानी में चढ़ के आया,
रौंद के हर दिशा से जाऊँगा तुम्हे,
ये अपनी माँ से मैं कह के आया।
मैं उस पिता का पुत्र हूँ,
जिसका रथ कभी रुक नहीं।
मैं उस पिता का ‘परमीत’ पुत्र हूँ,
जिसका धवज कभी झुका नहीं।

माँ


मांगता नहीं हूँ मैं,
किसी से,
दुआ जिंदगी कि,
सलामत है जब तक,
साँसे मेरी माँ कि.
सागर कि लहरें चाहें,
डूबा दें किनारा,
तोड़ नहीं सकती हैं,
वो मेरा हौसला.
आसमाँ जला दे चाहें,
गिरा कर बिजलियाँ,
नहीं मिटा सकती है,
वो मेरा काफिला.
डरता नहीं हूँ मैं,
देख के,
भीड़ दुश्मनों कि,
सलामत है जब तक,
साँसे मेरी माँ कि.
मांगता नहीं हूँ मैं,
किसी से,
दुआ जिंदगी कि,
सलामत है जब तक,
साँसे मेरी माँ कि.