हम राजपूतों की ये परंपरा है,
जीवन से जयादा जमीन की चाहत है.
बंजर हो या उर्वर हो,
तन-मन को उसकी गोद में ही राहत है.
हम राजपूतों की ये परंपरा है,
दोस्तों से जयादा दुश्मनों में शोहरत है,
मारते हैं-मरते हैं,
जंग में मिले जख्मों से ही मोहब्बत है.
हम राजपूतों की ये परंपरा है,
जो समर्पित कर दे वो ही महबूबा है,
सजाते हैं-सवारतें हैं, परमीत
उसकी बाहों में ही फिर जन्नत है.