कृषि महाविधालय के प्रांगण में,
जब कल लहरा रही थीं,
रंग-बिरंगी साड़ियां।
तो ऐसा लगा जैसे,
धरती पे आ गयी हैं,
सवर्ग से उतर कर,
कालिदास की वो नारियां।
एक सुन्दर सी साड़ी में,
लिपटा तुम्हारा बदन,
ऐसा लगा जैसे झूम रहा हो,
सारा उपवन।
वो तुम्हारा लहराता हुआ आँचल,
सागर की सैकड़ो लहरे थीं,
या खेत में लहलहाती,
गेहूं की हज़ारों बालीं।
जो भी था वो मंजर,
बहुत मनलुभावन था।
अब बस इतनी सी इल्तिजा है,
की अब जब निकालना,
फिर से इन गलियों में,
तो बसा लेना आँखों में,
हल्का सा वो काजल,
और बाँध लेना,
पाँवों में वो पायल।
ताकि गूंज उठे,
इन गलियों में,
फिर से वो ही तराना,
कहते है परमीत,
जिसे हम जैसे आशिक़
वो गुजरा हुआ जमाना।