दामाद


चढ़ के अइलन सूरज माथा पे,
अब तअ उठीं न हमार सैयां।
कब तक दही पे ई छाली जमीं,
कभी तअ चखी मठ्ठा-छाज सैयां।
सबके धान के बिया गिर गइल,
तनी सीखी न जाए के बथान सैयां।
रतिया में करेनी सब आपने मनमानी,
दिन में तअ तनी करी दूसर काम सैयां।
जाने बाबू जी कौन लक्षण देखनी,
की बाँध देनी हमारा साथ सैयां।
देखे में तअ अतना सीधा बानी,
पर बात-बात में फोड़े नी कपार सैयां।
रोजुवे नु माई पूछअ तारी,
अब बताई, बोली कौन बात सैयां।
गंगा नहइली, कतना पियरी चढ़ाइली,
तब जा के मिलल इह परमीत दामाद सैयां।

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