इंसानो की बस्ती का हर रंग फीका है,
हर शख्स को सूरज से ही शिकवा है.
सब कह रहे है चाँद में दाग ही नहीं,
सूरज ने अपनी किरणों से इसे झुलसाया है.
हर मोड़ पे गूंजती है सैकड़ो आवाजें,
हर शख्स ढूंढता है चोर कहाँ है.
सब कह रहे है की सूरज ने धोखा किया है,
इस उजाले में सबका रंग दीखता है.
हर शख्स के दामन में रंग काला है.,
कितना ढूंढा दिया लेकर, हर गली, हर कूचे में.
मैं अकेला हूँ तन्हा आज भी,
मेरे रंग का कोई मीत नहीं मिला है.
खूबसूरत हैं वो लोग जो भीड़ में छुपे हैं,
धुरंधर सिंह की किस्मत में बस ये ख़्वाब लिखा है.
Month: June 2014
हे प्रभु गणेश
हे प्रभु गणेश,
ज्ञान दो,
विज्ञान दो,
इन हाथों को,
कल्याण दो.
उद्धार हो मेरा,
प्रयास हो मेरा,
सफल सदा,
धुरंधर सिंह को,
ये वरदान दो.
हे प्रभु गणेश,
ये वरदान दो.
गुरु – गजानन
अगर गुरु जी आप ना होते,
तो, पूरब से पश्चिम,
उत्तर से दक्क्षिण तक,
हम भटकते।
दुनिया की ठोकरों,
से झुलसते, और
कुण्ठाग्रसित हो कर,
हम धधकते।
आशा के विपरीत है,
धुरंधर सिंह का जीवन,
मगर हर सफलता के,
आप ही हो गजानन।
सैया
सैया देलन एगो गुलाब अंखिया से अंखिया लड़ाके,
फिर त अ सो नहीं पायी मैं, बहियाँ में उनके जाके।
सखी कैसे कहीं सब बात, सब लूटा देहनी होश गवां के।
ना मैं कुछ बोल पायी, ना आँखे खोल पायी,
भाया तो मुझे कुछ नहीं पर ना मैं परमीत को रोक पायी।
सैया पहनाने लगे चूड़ी अंखिया में अंखिया डाल के,
फिर सो नहीं पायी मैं, बहियाँ में उनके समा के।
नथुनिया
कह अ न परमीत तानी अंखिया से,
केने-केने धोती खुलल रतिया में.
मत पूछ अ रानी इह बतिया रे,
बड़ा गजन लिखल रहल देहिया के.
नशा अइसन रहल की होश गवा देहनी,
अखियाँ खुलल त अ रहनी खटिया पे.
रात भर में लूट गइली सारा जोगवाल थाती,
बस रह गइल एगो नथुनिया रे.
तड़का
अभी रात मेरी बाहों में थी,
की सुबहा आके छनकने लगी.
मीठे-मीठे ख़्वाबों में धुरंधर के,
हकीकत का तड़का लगाने लगी.
नथुनिया दिलाई ना
तानी दूर-दूर से ए बालम धुरंधर जी,
नयनन में प्यार जगाई ना,
खेत कहीं नइखे भागल जात,
कहियो आँगन में खाट बिछाई ना.
कब तक बहेम खुदे बैल नियर,
कभी हमके भी छपरा घुमाई ना.
चूल्हा-काठी करत, हमार कमर टूट गइल,
गेहूं-धान बोआत, राउर उम्र हो गइल,
कब तक करेम इह दुनियादारी,
कभी गंगा में भी संगे नहाईं ना.
अरे बबलू बो, गुड्डू बो के, देख के जियरा जले,
एगो बालम के कमाई पे, रोजे सजाव दही कटे,
दौलत बचा के का होइ,
कभी एगो नथुनिया, हमें दिलाई ना.
कर्ण
समय है प्रतिकूल, भाग्य-विहीन मैं धूल,
पर माँ अब मैं लौट के नहीं आऊंगा,
माना, अर्जुन-कृष्णा की है प्रीत,
माना, तय है उनकी जीत,
मैं भी वचन अपना निभाउंगा,
इस कुरुक्षेत्र में मैं ही, अर्जुन से टकराउंगा।
धरा नहीं छोड़ती कांटो से भरे वृक्षों को,
तुमने तो ठुकराया, बिना आहार दिए मेरे मुख को,
माना, समय नहीं है दूर,
माना, काल भी है आतुर,
पर मैं अपनी तीरों से, बल अपना दिखाऊंगा,
इस कुरुक्षेत्र में मैं ही, अर्जुन से टकराउंगा।
अब मैं शिशु नहीं की स्तनपान कर पाउँगा,
ना मैं कुरुवंशी की राजन ही कहलाऊंगा।
माना, धर्म नहीं मेरा वसूल,
माना, कलंकित है मेरा खून,
पर, आखरी सांस तक दुर्योधन को बचाऊंगा,
इस कुरुक्षेत्र में मैं धुरंधर ही, अर्जुन से टकराउंगा।
गर्व
सागर की लहरे उछलती रहीं,
नौका मेरी डुबाती रहीं।
किनारों को मेरे डूबा के,
मुझे भटकाती रहीं।
ये सच है की,
मैं कुछ पा न सका जीवन में।
पर धुरंधर को राजपूत होने,
का गर्व कराती रहीं।
प्यार
मैं दिल को ये कहने लगा हूँ की,
प्यार झूठा होता है, और
धुरंधर ये जूठ बोलने लगा है.