तुम शिव हो, तुम शंकर हो,
इस जगत के तुम सवामी निरंतर हो।
मैं अज्ञानी पापी प्रभु,
ज्ञान के तुम सागर-समुन्दर हो.
तुम कालजयी, कालनायक,
विश्व के तुम संहारक हो.
मैं तुच्छं-सुक्ष्म,विरह-वाशना से बंधा,
निर्गुण के तुम धुरंधर हो.
Month: June 2014
माँ
माँ ने कहा था बचपन में,
तू लाल मेरा है लाखों में.
दुनिया मुझ पे हंसती रही,
पर माँ ने चूमा माथे पे.
आँचल में बिठाया,
बाहों में उठाया,
एसे रखा मुझे,
जैसे कोई रत्न रखा हो,
दुनिया से छुपा के.
समय इतना बदल गया,
मैं राजा से रंक बन गया.
हर रिस्ता टुटा मेरा प्रेम में,
फिर भी रखती है माँ धुरंधर,
को सीने से लगा के.
लक्ष्य और कर्ण
ए दिल,
ए दिल,
उड़-उड़,
के देख ले,
सपना है तेरा।
टूट जाए,
मिट जाए,
क्या जाता है तेरा।
यूँ ही, तू तो,
ठुकराया हुआ है,
यूँ ही, तू तो,
कितनी रातो से,
सोया नहीं।
तो उठ-उठ,
के मार,
लक्ष्य है तेरा।
जीते,
न जीते तू,
कट जाए,
मिट जाए,
क्या जाता है,
परमीत तेरा।
प्रिये
न रूठों प्रिये,
यूँ मुख मोड़ के.
की हम जियेंगे कैसे,
बिना इन ओठों के.
चाहो तो हर लो,
अब प्राण मेरे.
पर दूर न जाओ,
मेरी इन बाहों से.
की हम जियेंगे कैसे,
बिना इन ओठों के.
न रूठों प्रिये,
यूँ मुख मोड़ के.
की हम जियेंगे कैसे, परमीत
बिना इन ओठों के.
नारी
एक नारी का,
अपमान हुआ.
वीरो के सभा में,
खुले आम हुआ.
नेत्रहीनो ने भी,
बंद कर ली आँखे.
इंसान का,
ऐसा पतन हुआ.
ससुर-बहु,
पिता-पत्नी,
हर एक रिश्ता,
शर्मशार हुआ.
भारत की पावन,
धरती पे,
वेदो के,
ज्ञानियों के समक्ष,
ब्राह्मणो ने लाज,
मिटा दी.
और,
राजपूतों ने अपना पौरष.
जुल्फों से घसीटा,
एक अबला को,
और,
स्तन पे उसके,
प्रहार हुआ.
जिस तन ने,
सींचा है शिशु को,
उस तन पे,
भीषण वार हुआ.
पतियों ने किया,
पत्नी का,
वय्यापार जहाँ,
सत्ता के,
सत्ताधीशों ने,
न्याय के,
पालनहारों ने,
फिर उसको,
वासना का बाजार दिया.
जब छीनने लगा,
आँचल तन से,
और,
आभूषण उतरने लगा,
न वीरों के सभा,
में किसी ने,
मुख खोला.
न आँगन से ही,
प्रतिकार हुआ.
जब दर्द और,
अपमान से, परमीत
एक नारी ने,
चीत्कार किया.
भीष्म
न भीष्म हुआ है,
न भीष्म होगा,
ऐसा है,
पराक्रम मेरा।
जो दिशाएं,
बदल दे मेरी,
ऐसा नहीं हुआ है,
कोई सबेरा।
सूरज की किरणें,
भी मद्धम हो जाएँ,
मेरी तीरों पे।
बसंत को भी बाँध दूँ मैं,
चाहूँ तो,
अपनी बागों में।
नारी का कोई लोभ नहीं,
जीवन का कोई मोह नहीं,
ऐसा है शौर्य मेरा।
न भीष्म हुआ है,
न भीष्म होगा,
ऐसा है पराक्रम मेरा।
जो दिशाएं,
बदल दे मेरी,
ऐसा नहीं हुआ है,
परमीत, कोई सबेरा।
माँ का लाल
तेरे वास्ते ए माँ, मैं लौट के हाँ आऊंगा,
न तू उदास हो, मैं रण जीत के ही लौटूंगा।
आज समर में देख ले, ज़माना भी बढ़ के,
क्या द्रोण, क्या कर्ण,
सबको परास्त कर के ही लौटूंगा।
तेरा दूध ही मेरे शौर्य का प्रतीक है,
और क्या चाहिए, जब मुझपे पे तेरा आशीष है.
ना कृष्णा का, ना अर्जुन का,
मैं बस परमीत, लाल माँ तेरा कहलाऊंगा।
दामाद
चढ़ के अइलन सूरज माथा पे,
अब तअ उठीं न हमार सैयां।
कब तक दही पे ई छाली जमीं,
कभी तअ चखी मठ्ठा-छाज सैयां।
सबके धान के बिया गिर गइल,
तनी सीखी न जाए के बथान सैयां।
रतिया में करेनी सब आपने मनमानी,
दिन में तअ तनी करी दूसर काम सैयां।
जाने बाबू जी कौन लक्षण देखनी,
की बाँध देनी हमारा साथ सैयां।
देखे में तअ अतना सीधा बानी,
पर बात-बात में फोड़े नी कपार सैयां।
रोजुवे नु माई पूछअ तारी,
अब बताई, बोली कौन बात सैयां।
गंगा नहइली, कतना पियरी चढ़ाइली,
तब जा के मिलल इह परमीत दामाद सैयां।
माँ का आँचल
शेर की दुनिया इतनी छोटी क्यों है?
क्यों जंगल में शेर अकेला बैठा है?
हाथियों का झुण्ड, हिरणों का समूह,
फिर शेर क्यों गुमसुम अकेला है?
बल से नहीं प्रेम से जीतो,
बल से तो सिर्फ पत्थर टूटता है.
माँ के आँचल में सो के देखो,
यहीं पे सबकी किस्मत बदलता है.
खुदा की चाहत में भटकने वालों,
यहीं पे, परमीत, हर खुदा बसता है.
सल्तनत
इस सल्तनत के,
हम सरदार।
एक दिन होगी,
यहां अपनी सरकार।
लोग कहेंगें हमें,
राजकुमार।
और दिन भर बजायेंगे,
हम सितार।
लगातार-लगातार।
अपनी खेतों में होंगे,
ताड़ के पेड़।
लोगों से रखूँगा,
जी हर के बैर।
भर-भर के थालियां,
खाऊंगा,
भर पेट मछलियाँ।
होम मिनिस्टर से प्राइम मिनिस्टर,
सारे लगाएंगे मेरे बिस्तर।
अपनी सेना में होंगे,
बस छुछुंदर।
अति सुन्दर, अति सुंदर।
सेक्सी साइरन से थैन्डर थाई,
सब बनेंगी बस अपनी लुगाई।
फिर तो परमीत की,
होंगी रोजाना आँखे चार।
बारम्बार-बारम्बार।