दिलरुबा


अभी- अभी तो दिल तोड़ा है,
तेरे नैनों के मयखाने में.
फिर क्यों पूछती हो दिलरुबा,
हाल मेरा इस जमाने से.
बदल लिया है परमीत ने धड़कनो को,
तेरी खुशियों की खातिर.
फिर क्यों हो इतनी आतुर,
आने को मेरे जनाजे में.

धर्मराज


जहाँ पतियों ने खेली बाजी,
अपनी किस्मत बदलने को,
और दावँ पर लगाया पत्नी को,
बस खुद को बचाने को.
जब हुआ अपमान उस स्त्री का,
तो नजरे झुका ली सबने, परमीत
बस धर्मराज कहलाने को.