मैं अपने बाजूंओं से,
विधवंश मचा दूंगा।
क्या रावण,
क्या मेघनाद,
व्रह्माण्ड मिटा दूंगा।
काल की हुई,
कैसे ये हिम्मत,
की लक्ष्मण के प्राण हरे,
आज सारी सृष्टि में धुरंधर सिंह,
मैं प्रलय ला दूंगा।
मैं अपने बाजूंओं से,
विधवंश मचा दूंगा।
क्या रावण,
क्या मेघनाद,
व्रह्माण्ड मिटा दूंगा।
काल की हुई,
कैसे ये हिम्मत,
की लक्ष्मण के प्राण हरे,
आज सारी सृष्टि में धुरंधर सिंह,
मैं प्रलय ला दूंगा।