मानव – मन


मानव – मन, कितना चंचल,
छन से पल में, पल से छन में,
कभी इस उपवन से उस उपवन,
कभी इस वन से उस वन,
करता है भ्रमण,
मानव – मन.
न प्यास मिटे, न भूख मिटे,
न साध्य सधे, न लक्ष्य मिले,
कसता जाता है, नित-प्रतिदिन,
प्रतिदिन – नित्य एक नया,
लोभ का बंधन,
मानव – मन.
गुरु की बगिया में, प्रेमिका की यादें,
प्रियेशी की बाँहो में, गुरु की तस्वीरें,
उलझता है, मचलता है,
भटकता है, यूँ हीं, लक्ष्यहीन
सारा जीवन, धुरंधर सिंह का,
मानव – मन.

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