अतीत का चुम्बन


मैं भुला नहीं हूँ, आज तक तुझे,
पर भूलने लगा हूँ, मैं जमाना।
मैं नशा नहीं करता हूँ, पर अब,
ढूढ़ने लगा हूँ बहना।
तेरी गलियों से मेरा, कोई अब रिश्ता नहीं,
फूलों की बागों में भी, अब मैं नहीं जाता।
मेरा किसी से नहीं है, अब प्रेम कोई मगर,
हर कोई चाहता है, न जाने क्यों मुझसे याराना।
इन होठों को याद नहीं अब वो चुम्बन,
ना इन पलकों को याद है अब वो रात.
ठोकरों में हूँ मैं आज भी सही,
मगर सिख गया हूँ मुस्कराना।
खुदा की दुनिया से मेरा मोह,
है तेरे हुश्न से जयादा,
खुदा पे ही छोड़ दिया है अब मैंने,
मेरा आने वाला हर फ़साना।

 

परमीत सिंह परवाज

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