गलती


रात के अंधेरे से,
मत डर दिल,
रात में ही तो,
दियें जलते है.
बहती हुई नदियों,
में क्या रखा है,
ठहरे हुए पानी में ही,
कमल खिलते हैं.
ये तो मेरी गलती थी,
तेरी बस्ती में मांगने आ गया,
यहाँ तो दिल भी,
लोग तिजोरी में रखते हैं.

परमीत सिंह परवाज

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