फक्कड़


मैं पीता नहीं हूँ, पर पियक्कड़ हूँ मैं.
मैं बुद्धू ही सही, पर बुझक्कड़ हूँ मैं.
कहीं आता-जाता नहीं, पर घुमक्कड़ हूँ मैं.
मुझे क्या समझोगे, समझने वालों,
मैं फ़कीर नहीं हूँ, पर फक्कड़ हूँ मैं.
मुझे कुछ याद नहीं, कब क्या घटित हुआ,
पर आज भी उनके होठों का चक्कर हूँ मैं.

परमीत सिंह परवाज

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