पिता


तुम्हारी चरणों में पिता,
मैं भी अभिनन्दन करता हूँ,
मैं कर तो कुछ नहीं पाउँगा,
पर दिल से तुम्हारा बंदन करता हूँ.
ऐसी कोई सुबहा नहीं,
जब आँखों में आंसूं न आये,
ऐसी कोई रात नहीं,
जब दिल को तुम याद न आये.
मैं कर तो कुछ नहीं पाउँगा,
पर हर एक छन मैं,
तुम्हारी चरणों में नमन करता हूँ.
तुम्हारी चरणों में पिता,
मैं भी अभिनन्दन करता हूँ,
मैं कर तो कुछ नहीं पाउँगा,
पर दिल से तुम्हारा बंदन करता हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

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