प्रण


जहाँ विश्व थम जाएँ,
मैं वहां तक प्रयाश करूँ,
थक कर गिर भी जाऊं,
तो उठ कर साहस,
फिर एक बार करूँ,
हे प्रभु हरि विष्णु।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

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