होली


एक होली मैंने खेली,
मेरी पिचकारी थी,
और थी उनकी चोली।
भींगती थी वो,
मुस्करा-मुस्कारा कर,
जब-जब हमने,
रंग थी उनपे डाली।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

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