सौ बार लड़ूंगा हल्दीघाटी में


राते जितनी काली हो,
नशा उतना ही आता है मुझे,
दर्द जितना गहरा हो,
जीने में उतना ही मज़ा है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।
दिल्ली की रौनक मुबारक हो तुम्हे,
मेवाड़ की शान भाती है मुझे।
मैं राजपूत हूँ, कोई मुग़ल नहीं,
योवन की हर धारा तेरे लिए है,
माँ की गोद लुभाती है मुझे।
सौ बार लड़ूंगा,
हल्दीघाटी की लड़ाई,
लड़ने में मज़ा आता है मुझे।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

प्रण


जहाँ विश्व थम जाएँ,
मैं वहां तक प्रयाश करूँ,
थक कर गिर भी जाऊं,
तो उठ कर साहस,
फिर एक बार करूँ,
हे प्रभु हरि विष्णु।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

प्रण


अहंकार से रिक्त रहूँ,
पाखण्ड से मुक्त रहूँ,
प्रेम से सदा संचित रहूँ मैं,
पाप से सदा बंचित रहूँ मैं,
हे प्रभु विष्णु।
वेदो को गीतों में ढाल के,
जन – जन को पहना दूँ,
धर्म को माँ, और माँ को धर्म मान के,
सम्पूर्ण भारत को नहला दूँ.
अभिलाषों से रिक्त रहूँ,
लालशा से मुक्त रहूँ,
ज्ञान से सदा संचित रहूँ मैं,
अज्ञान से सदा बंचित रहूँ मैं,
हे प्रभु हरी बिष्णु।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

प्रभु हरि विष्णु


आप सा सरल कोई धर्म नहीं,
आप सा सबल कोई कर्म नहीं,
जो दौड़ती हैं आपकी नशों में,
मेरे मस्तिक में ओ ही प्राण दीजिये,
या प्रभु हरि विष्णु,
मुझपे भी थोड़ा धयान दीजिये।
ऐसा कोई पथ नहीं,
जो न मिले जाके आपके भवसागर में,
लक्ष्यहीन मेरे इस जीवन को,
मंजिल प्रदान कीजिये,
या प्रभु हरि विष्णु,
मुझपे भी थोड़ा धयान दीजिये।
सुगम नहीं है व्रत आपके नाम का,
पर ले लिया है प्रण,
अब चाहे तो मेरा बलिदान लीजिये,
या प्रभु हरि विष्णु,
मुझपे भी थोड़ा धयान दीजिये।
मुझसे भी कई हैं सबल यहाँ,
मुझसे भी कई है कर्मठ यहाँ,
भक्तों की भीड़ लगी है यहाँ,
सबसे पीछे खड़ा हूँ मैं निर्धन,
मौत से पहले मेरे जीवन को,
ऊंचाई का आसमान दीजिये,
या प्रभु हरि विष्णु,
मुझपे भी थोड़ा धयान दीजिये।

परमीत सिंह ‘धुरंधर’

प्रभु विष्णु


ज्ञान दीजिये, अरमान दीजिये,
या फिर मुझको ये वरदान दीजिये,
वृक्षों से हरी कर दूँ सारी धरती,
या प्रभु मुझको दर्शन दीजिये – दर्शन दीजिये।
मान दीजिये, सम्मान दीजिये,
या फिर मुझको ये वरदान दीजिये,
हर रोते हुए को मैं दे दूँ हंसी,
या प्रभु विष्णु मुझ पे भी धयान दीजिये।

परमीत सिंह परवाज

फक्कड़


मैं पीता नहीं हूँ, पर पियक्कड़ हूँ मैं.
मैं बुद्धू ही सही, पर बुझक्कड़ हूँ मैं.
कहीं आता-जाता नहीं, पर घुमक्कड़ हूँ मैं.
मुझे क्या समझोगे, समझने वालों,
मैं फ़कीर नहीं हूँ, पर फक्कड़ हूँ मैं.
मुझे कुछ याद नहीं, कब क्या घटित हुआ,
पर आज भी उनके होठों का चक्कर हूँ मैं.

परमीत सिंह परवाज

जवानी


दिल चाँद बनके आज भी घटता – बढ़ता रहता है,
ये जवानी है मेरे यार, दिल मचलता रहता है.
इतने कांटो से जख्मो को पाकर भी,
ये बागों में जाकर फूलों को चूमता रहता है.
ये जवानी है मेरे यार, दिल मचलता रहता है.

परमीत सिंह परवाज

अतीत का चुम्बन


मैं भुला नहीं हूँ, आज तक तुझे,
पर भूलने लगा हूँ, मैं जमाना।
मैं नशा नहीं करता हूँ, पर अब,
ढूढ़ने लगा हूँ बहना।
तेरी गलियों से मेरा, कोई अब रिश्ता नहीं,
फूलों की बागों में भी, अब मैं नहीं जाता।
मेरा किसी से नहीं है, अब प्रेम कोई मगर,
हर कोई चाहता है, न जाने क्यों मुझसे याराना।
इन होठों को याद नहीं अब वो चुम्बन,
ना इन पलकों को याद है अब वो रात.
ठोकरों में हूँ मैं आज भी सही,
मगर सिख गया हूँ मुस्कराना।
खुदा की दुनिया से मेरा मोह,
है तेरे हुश्न से जयादा,
खुदा पे ही छोड़ दिया है अब मैंने,
मेरा आने वाला हर फ़साना।

 

परमीत सिंह परवाज

गलती


रात के अंधेरे से,
मत डर दिल,
रात में ही तो,
दियें जलते है.
बहती हुई नदियों,
में क्या रखा है,
ठहरे हुए पानी में ही,
कमल खिलते हैं.
ये तो मेरी गलती थी,
तेरी बस्ती में मांगने आ गया,
यहाँ तो दिल भी,
लोग तिजोरी में रखते हैं.

परमीत सिंह परवाज

सुग्गा


सुग्गा पकरले बानी एगो बगइचा में,
आ व अ न सखी, तोहके दिखाईं,
बोलेला मिठू कइसन हमरा कहला में.
एके नजर डालनी त अ भूल गइल,
पंख पसारल, की छोड़ के अब आपन,
घर- द्वार बइठल बा हमरा आसरा में.
आवअ न सखी, तोहके दिखाईं, बोलेला
मिठू धुरंधर कइसन हमरा कहला में.