जवानी के लिल्ला


देख अ जवानी के लिल्ला,
एगो मुस्की पे,
हिलअइले बारी जिल्ला।
चलावअ तारी हसुआ घांस पर,
लेकिन,
चिरअ तारी हमार सीना।
देखअ जवानी के लिल्ला,
हिलअइले बारी जिल्ला।
बैला मारखाव भी आके,
इन्कारा आगे,
हो जाला एकदम सीधा।
देखअ जवानी के लिल्ला,
हिलअइले बारी जिल्ला।
अंखिया में कजरा डाल के,
चुनर के अपना छान के,
लीलअ तारी बीघा – पे – बीघा।
देखअ जवानी के लिल्ला,
हिलअइले बारी,
धुरंधर सिंह के जिल्ला।

नयका धान


जब से जवान भइल बारु,
नयका तू धान भइल बारु।
चमकअ तारु, उछलअ तारु,
चवरा से लेके खलिहान तक.
लूटअ तारु, धुनअ तारु,
गेंहूँ से लेके कपाश तक.
सारा जवार ई दहकता तहरे,
जोवन के ई लहक से.
बुढऊ के मन भी बहकता,
तहरे आँचल के उफान पे.
खेलअ तारु, खेळावअ तारु,
आँचरा में सबके बाँध के.
रगरअ तारु, झगड़अ तारु,
चढ़ के सबके दूकान पे.
जब से जवान भइल बारु,
धुरंधर सिंह के धान भइल बारु।

दिल्ली – सल्तनत


दिल्ली – सल्तनत की एक ही कहानी,
ताकत से तख़्त है, तख़्त से है रानी।
छल से जीतो चाहे बल से जीतो,
धर्म से या अधर्म से जीतो, धुरंधर सिंह
दुनिया करेगी गुणगान तुम्हारा,
और चुम्बन देगी रानी।

दिलवर


मैं हौले-हौले दिलवर, तुम्हारे पास आऊंगा,
कभी मैं मोहब्बत करूँगा, कभी सताऊंगा तुमको।
आईने की जरुरत ही क्या हैं, मेरी आँखे है तुमपे,
कभी मैं शिकायत करूँगा, कभी सजाऊंगा धुरंधर सा तुमको।

मानव – मन


मानव – मन, कितना चंचल,
छन से पल में, पल से छन में,
कभी इस उपवन से उस उपवन,
कभी इस वन से उस वन,
करता है भ्रमण,
मानव – मन.
न प्यास मिटे, न भूख मिटे,
न साध्य सधे, न लक्ष्य मिले,
कसता जाता है, नित-प्रतिदिन,
प्रतिदिन – नित्य एक नया,
लोभ का बंधन,
मानव – मन.
गुरु की बगिया में, प्रेमिका की यादें,
प्रियेशी की बाँहो में, गुरु की तस्वीरें,
उलझता है, मचलता है,
भटकता है, यूँ हीं, लक्ष्यहीन
सारा जीवन, धुरंधर सिंह का,
मानव – मन.

लड़कियां


रात्रि के तिमिर में,
अन्धकार के शिविर में,
जलाई जा रही हैं लडकियां।
सुबह-सुबह खबर आ रही है,
रेडियों पे, दूरदर्शन पे,
अखबार में की,
मिटाई जा रही हैं लडकियां।
३३ % का आरक्षण,
सबकी ये मांग है.
पर, आज भी,
करीना, विपाशा, प्रियंका,
और अब तो आलिया ही,
सबकी चाह हैं.
फिर भी,
घर-घर में सताई जा रही है लडकियां।
पापा के आने पे रो रोटी को,
गरम कर दे खाने को,
भाई के देखते ही जो,
पापड़ – तिलोड़ी छान दे,
ऐसी निपुण होनहार हो के भी,
मेहमान के सामने,
काम बताई जा रही है लड़कियां।
कौन है आज समाज में,
उनके हश्र का कारन, धुरंधर सिंह,
लोग कुछ भी कहते रहे,
मैं तो गिनायें जा रहा हूँ लडकियां।

लक्ष्मण


मैं अपने बाजूंओं से,
विधवंश मचा दूंगा।
क्या रावण,
क्या मेघनाद,
व्रह्माण्ड मिटा दूंगा।
काल की हुई,
कैसे ये हिम्मत,
की लक्ष्मण के प्राण हरे,
आज सारी सृष्टि में धुरंधर सिंह,
मैं प्रलय ला दूंगा।

लक्ष्मण


बिना तुम्हारे राम कुछ नहीं,
बिना तुम्हारे सीता की चाह नहीं,
बिना तुम्हारे अवध ही क्या,
अब ये ब्रह्माण्ड भी मेरा नहीं।
मैं नैनों को भींच लूंगा,
सीता को भी छोड़ दूंगा,
जीवन को सीचने वाला मैं,
अब सबका जीवन सोंख लूंगा।
बिना तुम्हारे सम्बन्ध नहीं,
बिना तुम्हारे कोई शौर्य नहीं,
बिना तुम्हारे राम नहीं,
और धुरंधर सिंह मेरा कोई धर्म नहीं।

कृष्ण


मधुवन में मैं भी नाची,
मधुवन में तू भी नाची,
सखी, समझ नहीं पायी मैं,
कृष्ण थे किसके साथ में.
मटकी तेरी टूटी पनघट पे,
चुनर मेरी खोयी यमुना-तट पे.
सखी धुरंधर सिंह,
समझ नहीं पायी मैं,
कृष्ण थे किसके साथ में.

प्रेम इतना


पिता- पुत्र का प्रेम इतना, प्राण निकल गए राम पे।
दसों दिशा को जीतने वाले, उठ न पाये पुत्र- वियोग में।
भाई-भाई का प्रेम इतना, प्रियेशी को छोड़ गए राम पे।
छोड़ के उर्मिला को दौड़े, लक्ष्मण पीछे- पीछे राम के।
भाई-भाई का विरह इतना, मुख मोड़ गए भरत माँ से।
छोड़ दिया हर सुख जीवन का, बस राम के एक खड़ाऊं पे।
बंधू-बंधू का प्रेम इतना, भूल गए केवट हर धर्म-धाम रे।
पार लगाया सरयू के, बस पखार के पाँव राम के।
पति-पत्नी का प्रेम इतना, राम दौड़े एक सवर्ण मृग पे।
मायापति ही छले गए धुरंधर सिंह, सीता के प्रेम में।