माँ


एक छोटी सी झोपडी में,
चूल्हे को जलाकर,
माँ ने सेंकी है रोटी,
अपने हाथों को जलाकर.
तीन दिनों से भूखी माँ,
पानी की बूंदो पे,
मुस्काती, खिलाती,
लाल को अपने,
अपना पेट जला कर.
मैली-कुचली साड़ी में,
पैबंद को लगाकर,
खुश है मेले में माँ,
बच्चे को खिलौने दिलाकर.
एक छोटी सी झोपडी में,
गिल्ली मिटटी पे लेटी माँ,
जागती है रातभर, गीत गाती,
अपने बच्चों को बिस्तर पे,
मिट्ठी नींद में सुलाकर.

परमीत सिंह धुरंधर 

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