मैं नहीं हूँ


मंजिलों को पाने के लिए,
समझौतों पे समझौते हुए.
एक बार मंजिल मिल जाए,
तो फिर,
कौन अपने, कौन पराये।
ये वसूल रखने वालों की,
भीड़ में मैं नहीं हूँ.
एक ही समय में खाता हूँ,
सेवइयां और मछलियाँ, दोनों
ईद और दिवाली के,
इंतज़ार में बैठा कोई,
मजहबी मैं नहीं हूँ.
और उठता हूँ आज भी,
माँ की लोरी सुन कर,
रेडिओ मिर्ची और एफ. एम.,
से जागने वालो की,
जामत में मैं नहीं हूँ.

परमीत सिंह धुरंधर

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