थोड़ी – थोड़ी आग है, थोड़ी सी बरसात है,
ये जिंदगी मुझे खुदा, अब भी लगती बड़ी ख़ास है.
ठोकरें भी मेरे हौसले तो नहीं तोड़ पाती हैं,
काँटों के बीच में ही तो कलियाँ मुस्काती हैं.
थोड़ी – थोड़ी आस है, थोड़ी सी प्यास है,
ये जिंदगी मुझे खुदा, अब भी लगती बड़ी ख़ास है.
टूटते ख़्वाब भी नहीं मुझे रोक पाते हैं,
काँटों के बीच में ही तो फूल मुस्काते हैं.