मेरी सारी दौलत ले कर,
वो सोहरत मुझे लौटा दो,
जब तुम कहती थी,
मेरे कानों में,
की ये जलता दिया बुझा दो,
वो जलता दीपक बुझा दो.
मेरी सारी खुशियां ले कर,
वो ग़मों की राते लौटा दो,
जब तुम कहती थी,
मुझसे,
की वो खुली किवाड़ भिड़ा दो,
वो खुली किवाड़ भिड़ा दो.
परमीत सिंह धुरंधर
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