परिन्दें आसमा के,
धरती पे सिर्फ दाना,
चुगते हैं.
और हम धरतीवालों,
की किस्मत को देखो,
हम आसमा को छू कर भी,
प्यासे रहते हैं.
माँ को कुचल कर,
हम उस न दिखने वाले,
खुदा की दर पे,
सर झुकाते हैं.
जो बिना माँ के,
एक चीटीं भी नहीं गढ़,
पाते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर