तेरा वैभव मेरी माँ,
हैं तेरी ये मुस्कान।
न चिंता कर,
मेरी इस देह की,
ये जगा जायेगी,
सारा हिंदुस्तान।
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल की सुबह में।
पर जलती रहे,
तेरे चूल्हे में,
हरदम ये आग।
परमीत सिंह धुरंधर
तेरा वैभव मेरी माँ,
हैं तेरी ये मुस्कान।
न चिंता कर,
मेरी इस देह की,
ये जगा जायेगी,
सारा हिंदुस्तान।
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल की सुबह में।
पर जलती रहे,
तेरे चूल्हे में,
हरदम ये आग।
परमीत सिंह धुरंधर