1957


बहुत सुने हैं,
हमने,
किस्से ५७ के,
संग्राम की.
ऐसे लड़े थे,
मेरे पुरखे,
की,
एक था रंग,
सुबह और शाम की.

परमीत सिंह धुरंधर 

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