अब जीने का मन नहीं


अकेला हूँ, थका हूँ,
शिकायत करूँ, तो कहाँ,
हर तरफ से ,
ठुकराया हुआ हूँ।
तमन्नाएँ इतनी पाल ली,
की उनके बोझ से दबा हूँ। 
ख़्वाब इतने देखे,
की उनके टूटने से, जख्मी हूँ। 
चाँद ऐसा मिला, सफर में,
की उसके छुपने से,
अंधेरों में बैठा हूँ। 
जमाने से इतनी दुश्मनी,
की हर राह में अकेला हूँ। 
जवानी की मस्ती में इतना दौड़ा,
की पावों में अब दम नहीं।
इतना उड़ा आसमा की चाहत में,
की साँसों में दम नहीं।
कमबख्त ये दिल मेरा,
उनकी मोहब्बत में इतना डूब गया,
की अब,
किनारों तक पहुचने का दम नहीं।
की अब जीने का मन नहीं,
की अब जीने का मन नहीं।

 

परमीत सिंह धुरंधर 

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