लो,
दर्द के अपने कुछ किस्से,
आज तुम्हे भी सुना दूँ.
जो कुछ मीठा है मेरे पास,
आज तुम्हे भी चखा दूँ.
मुझे अब भूख नहीं लगती,
और तुम आज भी भूखे हो.
तो लो,
बैठो।
अपनी थाली में से कुछ,
आज तुम्हे भी खिला दूँ.
खा लो,
पर अब पानी मत माँगना.
वो मेरे पास मीठा नहीं,
खरा है.
तुम प्यास मिटाने के लिए जी रहे,
मैं प्यासा ही जी रहा हूँ.
की उसे पी कर,
मैं आज तक,
प्यासा ही जी रहा हूँ,
प्यासा ही जी रहा हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर