माँ


पर्वतो के पास हैं हज़ारों नदियाँ,
वृक्षों के पास है लाखो शाखाएं।
मेरी माँ का एक मैं ही हूँ सहारा,
तो कैसे तोड़ दूँ उसकी आशाएं।
रात के पास है चाँद-तारे,
दिन को मिला सूरज की निगाहें।
माँ की उम्मीद सिर्फ मैं हूँ,
तो कैसे तोड़ दूँ उसकी आशाएं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

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