माही


शैतान माही की चंचल शैतानियाँ,
सीधे से मनु की कीमती नादानियाँ,
उसपे से बाबूसाहब की कभी न खत्म,
होने वाली लम्बी कहानियाँ।
हसीं पल वो लौट के नहीं आ रहे,
पर छोड़ गए हैं धड़कनो पे गहरी निशानियाँ।
चावल, दाल, सब्जी, और उसपे चलती थी,
भाभी के हाथों से मीठी मछलियाँ।
वो स्वाद, वो एहसास, वो मिठास,
अब कहाँ सजने वाली हैं,
रसोई में मेरे ये खनकती थालियाँ।

परमीत सिंह धुरंधर

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