काफ़िर और ताज


सुबह के इंतज़ार में रात भर बैठे रहें,
काफ़िर ये नहीं तो कौन है?
जो एक दिया तक नहीं जला पाएं.
इनसे अच्छे तो वो हैं,
झूठा ही सही, कुछ ख़्वाब तो देखते हैं.
एक की मोहब्बत में, ताज बना गए,
अरे काफ़िर ये नहीं तो कौन है?
जो कितनों का पेट कुचल गए.
ऐसी मोहब्बत किस काम की?
उनकी जुल्फों का शौक किस काम का?
वो बदलती है गजरा,
अपने हर रात की शौक में,
अरे काफ़िर ये नहीं तो कौन है?
जो कितने भौरों को मार गए.

परमीत सिंह धुरंधर

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