तेरी दो पलकें सागर सी, नए-नए मयखाने हैं,
उमरिया सारी तुझको दे दूँ, पढ़ते रह फिर पाठशाले में.
मत पूछ राही मन से मेरे जोबन में रस है कितना,
दिल को तेरे सींच दूँ, ठहर दो पल, पथ है लम्बा।
फूल – पाती रख ले सब अपने झोले में भर के,
मेरे अंगों पे तो सोना, पीतल सब है पिघला।
परमीत सिंह धुरंधर