जोबन


तेरी दो पलकें सागर सी, नए-नए मयखाने हैं,
उमरिया सारी तुझको दे दूँ, पढ़ते रह फिर पाठशाले में.
मत पूछ राही मन से मेरे जोबन में रस है कितना,
दिल को तेरे सींच दूँ, ठहर दो पल, पथ है लम्बा।
फूल – पाती रख ले सब अपने झोले में भर के,
मेरे अंगों पे तो सोना, पीतल सब है पिघला।

 

परमीत सिंह धुरंधर

जय गणपति-जय मंगलमूर्ति


पापों से मुक्ति,
ज्ञान और भक्ति,
सब मुझको दीजिये,
हे गणपति.
मैं हूँ आपका सेवक,
आप मेरे स्वामी,
हे अधिपति।
मेरे मस्तक में,
प्रवाह करो,
ह्रदय में मेरे,
वास करो.
आँखों में ज्योति,
हो तुम्हारी,
साँसों में संस्कार,
भरो,
हे मंगलमूर्ति।

 

परमीत सिंह धुरंधर

माही


शैतान माही की चंचल शैतानियाँ,
सीधे से मनु की कीमती नादानियाँ,
उसपे से बाबूसाहब की कभी न खत्म,
होने वाली लम्बी कहानियाँ।
हसीं पल वो लौट के नहीं आ रहे,
पर छोड़ गए हैं धड़कनो पे गहरी निशानियाँ।
चावल, दाल, सब्जी, और उसपे चलती थी,
भाभी के हाथों से मीठी मछलियाँ।
वो स्वाद, वो एहसास, वो मिठास,
अब कहाँ सजने वाली हैं,
रसोई में मेरे ये खनकती थालियाँ।

परमीत सिंह धुरंधर

मन का प्रेम


अब अकेले खाने का मज़ा आएगा,
हर कौड़ किसी की याद लाएगा।
ये कोई बदन का दर्द नहीं,
की योग करके मिटा दूँ.
ये तो मन का प्रेम है,
अब आत्मा के साथ ही जाएगा।

परमीत सिंह धुरंधर

शौक


अब कहाँ चलती है गोलियाँ मोहब्बत में,
हमें तो शौक है अब उनकी गालियों का.
आज भी जब गुजरता हूँ उनकी गलियों से,
तो भर जाती हैं मेरी झोलियाँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर

मोहब्बत


बुलंदियों का इतना है शौक मुझे,
की समझ नहीं पाया मोहब्बत को.
कभी-कभी तो वो मिलती थीं,
मैं सुनाने लगता था अपनी शोहरत को.

परमीत सिंह धुरंधर

माँ


पर्वतो के पास हैं हज़ारों नदियाँ,
वृक्षों के पास है लाखो शाखाएं।
मेरी माँ का एक मैं ही हूँ सहारा,
तो कैसे तोड़ दूँ उसकी आशाएं।
रात के पास है चाँद-तारे,
दिन को मिला सूरज की निगाहें।
माँ की उम्मीद सिर्फ मैं हूँ,
तो कैसे तोड़ दूँ उसकी आशाएं।

 

परमीत सिंह धुरंधर

वक्त और किस्मत


वक्त के बदलने का इंतज़ार मत कर मुसाफिर,
वक्त और किस्मत में एक ही भेद है.
वक्त किसी का मोहताज़ नहीं होता,
और किस्मत पे किसी का जोड़ नहीं होता.

 

परमीत सिंह धुरंधर

शौक


अब कहाँ चलती है गोलियाँ मोहब्बत में,
हमें तो शौक है अब उनकी गालियों का.

 

परमीत सिंह धुरंधर

प्यास


तुम्हें दर्जनो की मोहब्बत मिले,
मैं यूँ ही प्यासा भटकता रहूँ।
तुम्हें चाँद-तारों की रोसनी मिले,
मैं यूँ ही अंधेरों में जाता रहूँ।
मेरी मोहब्बत ही सच्ची थी,
पर मैं सोना-चांदी नहीं ला सका।
तुम्हें सोहरत मिले, तुम्हें दौलत मिले,
मैं यूँ ही फकीरी में तेरी चित्र बनता रहूँ।
तमन्ना थी की आँखों का काजल बनूँ,
जुल्फों का गजरा, होठों की लाली बनूँ।
तेरा सौंदर्य सदा सबकी प्यास जगाता रहे,
मैं यूँ ही आँसुंओं से प्यास मिटाता रहूँ।

 

परमीत सिंह धुरंधर