मत पूछो,
मेरी जवानी के किस्से,
मोहल्ले के सारे अपने,
ही बच्चे हैं।
क्या हुआ,
जो कहते हैं,
हमें वो चाचा.
कमबख्त,
खून के ये रिश्ते,
ऐसे ही,
अच्छे हैं.
महफूज है मेरी बाहों में,
आकर ये.
ये इनकी माँ भी जानती हैं,
की हम आज भी,
दिल के कच्चे हैं.
दर्द तब होता है,
जब वो कहती हैं, मियां,
और तुरंत कहती हैं,
अलबिदा।
मुस्काती हैं ये सोचकर,
की हम आज भी उनके,
धागे से बंधें हैं.
परमीत सिंह धुरंधर