ऐसे नाहीं,
वैसे नाहीं,
ए राजा जी.
पाहिले कुछु त,
चढ़ाई हमपे,
ए राजा जी.
ए ने नाहीं,
वो ने नाहीं,
ए राजा जी.
पाहिले कुछु त,
दिखाई हमके,
ए राजा जी.
मत कुछ सिखाई,
ना बाताई,
ए राजा जी.
पाहिले रखीं,
एहिजा मुहवा-दिखाई,
ए राजा जी.
परमीत सिंह धुरंधर
ऐसे नाहीं,
वैसे नाहीं,
ए राजा जी.
पाहिले कुछु त,
चढ़ाई हमपे,
ए राजा जी.
ए ने नाहीं,
वो ने नाहीं,
ए राजा जी.
पाहिले कुछु त,
दिखाई हमके,
ए राजा जी.
मत कुछ सिखाई,
ना बाताई,
ए राजा जी.
पाहिले रखीं,
एहिजा मुहवा-दिखाई,
ए राजा जी.
परमीत सिंह धुरंधर
दौलत की जितनी है,
मुझे चाहत,
उतनी दौलत कहाँ,
मिलती है.
माँगा है जिसे,
मोहब्बत में,
वो अब कहाँ,
दिखती है.
अरे प्यारों,
ये ही तो है जिंदगी,
ये कब हमारी मुठ्ठी में,
बंद रहती है.
परमीत सिंह धुरंधर
तुझको प्यार ही नहीं,
मैं संसार कहता हूँ,
तू मेरी चाहत है,
ये खुले आम कहता हूँ.
ये जान कर भी,
की तू मेरी नहीं है,
तेरे तिब्बत पे मैं,
अपना अधिकार कहता हूँ.
माना की कभी तू बाहों,
में नहीं आएगी मेरे,
पर मैं आज भी तेरे,
क्रीमिया पे निगाहें रखता हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर
१५ ऑगस्त पे,
ए कलम,
क्या लिखूं,
आज.
तेरी ही स्याही,
अलख जगाती,
और,
गिराती है ताज.
क्या कहूँ उनपे,
जो जला गए स्वाधीनता,
की आग.
क्या नापूँ उनको,
जो माप गए सूरज,
और चाँद।
ये कोई चन्द बिन्दुओं,
को मिलाती रेखा नहीं,
ये तो वो मानचित्र है,
जिसपे लूटा दी,
माताओं ने पानी गोद,
और सुहागिनों ने,
अपनी सुहाग।
ए कलम,
क्या लिखूं,
उन वीरांगनाओं पे,
आज.
जिन्होंने जौहर खेली,
जब उम्र थी, केवल
सोलह साल.
परमीत सिंह धुरंधर
बहुत सुने हैं,
हमने,
किस्से ५७ के,
संग्राम की.
ऐसे लड़े थे,
मेरे पुरखे,
की,
एक था रंग,
सुबह और शाम की.
परमीत सिंह धुरंधर
जहाँ गंगा की हर धार में,
खेलती है जवानी,
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।
जहाँ शंकराचार्य ने,
वेद गढ़े,
और नानक ने,
दिए गुरुवाणी।
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।
जहाँ पहन केशरिया,
भगत सिंह, निकले दुल्हन लाने,
और जीजा बाई ने दी,
शिवा जी को शिक्षा अभिमानी।
वो धरती है भारत की,
जहाँ वीर हुए बलिदानी।
परमीत सिंह धुरंधर
तेरा वैभव मेरी माँ,
हैं तेरी ये मुस्कान।
न चिंता कर,
मेरी इस देह की,
ये जगा जायेगी,
सारा हिंदुस्तान।
मैं रहूँ या न रहूँ,
कल की सुबह में।
पर जलती रहे,
तेरे चूल्हे में,
हरदम ये आग।
परमीत सिंह धुरंधर
विश्व भारती,
ये है धरती,
राम-रहीम जहाँ,
एक साथ खेले.
लहराने को तिरंगा,
वीर यहाँ,
हँसते-हँसते,
झूल गए.
देखो इस हिमालय को,
हमने जिसका मान रखा,
अपने लहू से रंग दिया,
जब-जब इसका शान घटा.
विश्व भारती,
ये है धरती,
जहाँ बड़े- बड़े संग्राम हुए.
और यहीं पे,
बुध-महावीर ने,
शान्ति के पाठ पढ़ें.
परमीत सिंह धुरंधर
परिन्दें आसमा के,
धरती पे सिर्फ दाना,
चुगते हैं.
और हम धरतीवालों,
की किस्मत को देखो,
हम आसमा को छू कर भी,
प्यासे रहते हैं.
माँ को कुचल कर,
हम उस न दिखने वाले,
खुदा की दर पे,
सर झुकाते हैं.
जो बिना माँ के,
एक चीटीं भी नहीं गढ़,
पाते हैं.
परमीत सिंह धुरंधर
इश्क़ इस कदर नाकामियों में पल रहा है,
की मैं मौत से मोहब्बत मांग रहा हूँ.
वो भी खेलने लगी है अब आँख-मिचौली,
जिससे मैं अपना दिल लगा रहा हूँ.
परमीत सिंह धुरंधर