पापी मन


पापी मन,
नारी के तन,
में कितना,
उलझा है.
भूल के,
अपने माता-पिता,
जुल्फों में,
लेटा है.

परमीत सिंह धुरंधर 

माँ


माँ है,
माँ है,
माँ है, दोस्तों,
धर्म से, ज्ञान से,
वेद से, पुराण से,
सबसे महान दोस्तों।
विधि से, विधान से,
मानव के कल्याण से,
माँ,
सबसे महान दोस्तों।

परमीत सिंह धुरंधर 

माँ


एक छोटी सी झोपडी में,
चूल्हे को जलाकर,
माँ ने सेंकी है रोटी,
अपने हाथों को जलाकर.
तीन दिनों से भूखी माँ,
पानी की बूंदो पे,
मुस्काती, खिलाती,
लाल को अपने,
अपना पेट जला कर.
मैली-कुचली साड़ी में,
पैबंद को लगाकर,
खुश है मेले में माँ,
बच्चे को खिलौने दिलाकर.
एक छोटी सी झोपडी में,
गिल्ली मिटटी पे लेटी माँ,
जागती है रातभर, गीत गाती,
अपने बच्चों को बिस्तर पे,
मिट्ठी नींद में सुलाकर.

परमीत सिंह धुरंधर 

मस्तानी


This poem is about Mastani (http://en.wikipedia.org/wiki/Mastani), who was the wife of Peshwa Baji Rao I (http://en.wikipedia.org/wiki/Baji_Rao_I).

मस्तानी की आँखे,
ह्रदय से बोलतीं थीं,
बाजीराव की बाहों में,
जब वो अमृत घोलती थीं.
मुख पे चन्द्र की आभा,
वक्षों पे सागर लिए थी.
नयन-कटार में,
छत्रशाल सी निपुण,
अपने योवन में,
सिंधु सी बलवती थी.
खिलने लगे पुष्प उधान में,
कोयल चहकने लगी थी.
रण में मिले जख्मों को,
वो चाँद बनके हरने लगी थी.
पुलकित मस्तानी जब,
खिलने लगी कवल सा,
बाजीराव के पौरष को,
एक नया अभिमान मिला.
जिस शमशीर ने गढ़ा,
भारत का नया मानचित्र,
उसकी चमक का सौभाग्य खिला.

परमीत सिंह धुरंधर

जिंदगी


जिंदगी एक दुकान है, जहाँ कुछ भी मेरा नहीं.

प्रकृति


सूर्य कहते हैं,
प्रखर बनो.
हवा कहती है,
बहते रहो.
नदिया कहती है,
जोश से जियो.
और किनारें कहते हैं,
प्रेम में टूट चलो.
वृक्ष कहते हैं,
सदा ऊपर उठो.
कलियाँ कहती है,
खिलते रहो.
फूल कहते हैं,
समाज को,
सुगन्धित करो.
और भौरें कहते हैं,
विचरते रहो.
लहरें कहती हैं,
उछल कर वार करो.
चाँद कहता है,
शीतल बनो.
अग्नि कहती है,
खुद पहले जलो.
और बादल कहते हैं,
बरसने में ना,
भेद करो.
रात कहती है,
दीपक बनो.
दिया कहता है,
पथ प्रदर्शित करो.
पत्थर कहते हैं,
स्थिर रहो.
और राहें कहती है,
मंजिल की तरफ,
बढ़ते रहो.
उषा कहती है,
श्रम करो.
साँझ कहती है,
मनन करो.
फल कहते हैं,
मिठाश बांटों.
और काटें कहते हैं,
स्वीकार करो.
दर्पण कहता है,
सत्य समझों।
जीवन कहता है,
समय का मान करो.
समय कहता है,
त्याग करो.
और मोह कहता है,
बलिदान करो.

परमीत सिंह धुरंधर