माँ का कोई रूप नहीं,
माँ का कोई रंग नहीं.
माँ तो दिव्य है,
माँ साक्षात ब्रह्म है.
माँ ही ओमकार है,
माँ ही निराकार है.
धरती पर माँ,
भागवत का रूप साकार है.
विश्व का आधार,
धर्म का श्रृंगार,
माँ प्रेम का सास्वत,
भण्डार है.
संस्कृति माँ से, माँ ही ज्ञान,
स्वयं नतमष्तक है भगवान,
सृष्टि का माँ ही,
पालनहार है.
परमीत सिंह धुरंधर