हया


वो आज भी,
निगाहों में हया रखती हैं,
बस मोहब्बत में ही बेहया हैं.
तरप उठती हैं,
गोरैया के जख्म देख कर,
बस आशिक़क़ों की,
मौत की दुआ रखती हैं.
न जाने क्यों पूजते हैं,
दुनिया वाले देवी कहकर,
वो जो सीने में अब भी,
वासना और फरेब रखती हैं.

परमीत सिंह धुरंधर

Leave a comment