खिदमत माता – पिता की,
कभी बेकार नहीं जाती।
किस्मत यार की कभी,
किसी के काम नहीं आती।
गुलशन में लाखों फूल खिले हैं,
पर भौरों के प्यास नहीं जाती।
हज़ारो तारे हैं आसमान पे,
एक चाँद के बिना,
अमावस्या की अन्धकार नहीं जाती।
और क्या लिखूं उनकी बेवफाई पे,
कम्बखत,
मेरी साँसों से उनकी महक नहीं जाती।
परमीत सिंह धुरंधर