वो बैठी हैं अपने कमरे में,
एक तस्वीर को सीने से लगाये.
की कल तक जिस दिल में हम बसते थे,
उस दिल में किसी और को छिपाए.
हमने पूछा की हुजूर,
क्या रखा है सीने में छुपा के.
वो मुस्कराये, खूब मुस्कराये,
राज को सीने में गहरा दबा के.
फिर हौले से बोले आँचल को संभाल के,
कुछ राज सीने में ही अच्छे है,
वो होठों के काबिल नहीं हैं.
अपनी मोहब्बत का वास्ता दे कर,
जब हमने मिलना चाहा।
बड़े प्यार से मेरे महबूब ने,
संदेसा भिजवाया.
मेरे बाबुल का समाज में रुतबा है,
ये मोहब्बत अब उसके काबिल नहीं है.
परमीत सिंह धुरंधर