अकेला


सुबह इतनी बारिश हुई,
की मैं शाम तक गीला रहा.
जिस रात हमें तुम छोड़ गयी थी प्रिये,
मैं सागर के तट पे टहलता रहा.
उठती हुई लहरो के बीच,
मैं अकेला ही जूझता रहा.
अनुकूल नहीं वो प्रतिकूल पल था,
विफल रही हर एक योजना।
मज़धार में फंसा मैं,
तेरी तस्वीर को संजोता रहा.

 

परमीत सिंह धुरंधर

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