शोर सुन के शहर वाले निकले,
भोर में फरियाद वाले निकले।
बिछा कर निगाहें बैठा हूँ हर गली-चौराहे पे,
जाने कब किधर से मेरा चाँद निकले।
परमीत सिंह धुरंधर
शोर सुन के शहर वाले निकले,
भोर में फरियाद वाले निकले।
बिछा कर निगाहें बैठा हूँ हर गली-चौराहे पे,
जाने कब किधर से मेरा चाँद निकले।
परमीत सिंह धुरंधर