खौफ बढ़ चूका है, दीवारे ढह चुकीं हैं.
मंदिर और मस्जिद दोनों सुनसान पड़े हैं.
वो निकलीं है आज सज के, सवर के,
बूढ़े भी अब ईमान छोड़ चुके हैं.
गली, चौरास्ता, छत, पेड़, खुलेआम,
हर मोड़ पे भीड़ बढ़ चुकी है.
हर सख्श पसीने से तर-बतर,
दिल की धड़कने थम चुकी है.
वो निकली हैं आज अपनी जुल्फें लहरा के,
बढ़ई, लोहार, धोबी, हलवाई,
जोरू, गोरु, सब काम छोड़ चुके हैं.
आग बढ़ रही है, रूह काँप रही है,
कंठ सुख रहे हैं, तन-मन तरप रहा है.
हिन्दू-मुस्लिम, जाट-पात, सब मिट चूका है,
हर तरफ से, छोटे-बड़े सबकी निगाहें टिक चुकी है.
वो निकली हैं आँखों में सुरमा लगा के,
अमीर-गरीब, गावं- जवार, पंडित-मौलवी,
सब इस बाढ़ में डूब चुके हैं.
परमीत सिंह धुरंधर